Sunday, October 24, 2010

प्रीतम तुम लौट आये

सूरज की पहली किरण ने
किया उजियारा
रात का अंधियारा हुआ
नौ दो ग्यारह

भोर होते ही
चिडियों ने गीत गाये
मुझे लगा जैसे कि
प्रीतम तुम लौट आये

19 comments:

  1. सतसैय्या के दोहरे...
    देखन में छोटे लगें....
    बहुत सुन्दर रचना!

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  2. bahut hi khubsurat ehsas. kabhi hamari rachnao par bhi gaur kare.

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  3. खूबसूरत पंक्तियां।

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  4. बहुत सुन्दर रचना|

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  5. bahut khoob likha trisha ji aise hi likhte rahiye aap ki sundar sundar rachnayen padne ko milti rahengi .... thanx

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  6. अद्भुद पंक्तियों के आभार स्वरुप ..............

    सच तो यह है कि वह
    कहीं गए ही नहीं थे !
    तुम्हारे नयनों के सामने नहीं
    बल्कि मन में बसे थे !!
    भोर की सुनहरी किरण
    और पक्षियों के गीत ने !
    मिला दिया है तृषा को
    उनके मन मीत से !!

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  7. kam panktiyo me bahut kuchh kaha daala .......achchhi prastuti

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  8. ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

    हमारे नये एगरीकेटर में आप अपने ब्लाग् को नीचे के लिंको द्वारा जोड़ सकते है।
    अपने ब्लाग् पर लोगों लगाये यहां से
    अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से

    कृपया अपने ब्लॉग पर से वर्ड वैरिफ़िकेशन हटा देवे इससे टिप्पणी करने में दिक्कत और परेशानी होती है।

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  9. प्यारा लिखा है आपने....
    प्रतीक्षारत........

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  10. ब्लॉग जगत में स्वागत है.......

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  11. इस नए और सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका हिंदी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  12. सुन्दर नव-अगीत..बधाई........ नव-अगीत , अतुकान्त कविता की एक विधा--अगीत का एक छंद है जो ३ से ५ पन्क्तियों का अतुकान्त गीत होता है।

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  13. वाह कमाल का लिखा है. जारी रहें.
    --
    धनतेरस व दिवाली की सपरिवार बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं.
    -
    वात्स्यायन गली

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  14. शानदार प्रयास बधाई और शुभकामनाएँ।

    एक विचार : चाहे कोई माने या न माने, लेकिन हमारे विचार हर अच्छे और बुरे, प्रिय और अप्रिय के प्राथमिक कारण हैं!

    -लेखक (डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश') : समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं 1994 से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान- (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। जिसमें 05 अक्टूबर, 2010 तक, 4542 रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता राजस्थान के सभी जिलों एवं दिल्ली सहित देश के 17 राज्यों में सेवारत हैं। फोन नं. 0141-2222225 (सायं 7 से 8 बजे), मो. नं. 098285-02666.
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